नियम 8 और 9 मिलकर एक ऐसी सीमा खींचते हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी सेवा की जिम्मेदारियों के बीच है। इसे समझना आज के सोशल मीडिया युग में हर कर्मचारी के लिए ज़रूरी है।
नियम 8 — रेडियो, टेलीविजन और प्रेस को संवाद
नियम 8(1) — प्रसारण और प्रेस पर प्रतिबंध
कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना पूर्व अनुमति के निम्नलिखित नहीं करेगा:
- रेडियो प्रसारण में भाग लेना,
- कोई टेलीविज़न साक्षात्कार देना,
- कोई ऐसा लेख, पत्र, या दस्तावेज़ प्रकाशित करना जो सरकारी नीतियों या कार्यों से संबंधित हो।
सोशल मीडिया पर यही नियम लागू होता है — ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब या कोई भी मंच।
नियम 8(2) — साहित्यिक, कलात्मक और वैज्ञानिक कार्य
यदि कर्मचारी कविता, उपन्यास, तकनीकी पेपर, या कला से संबंधित कोई ऐसा कार्य प्रकाशित करना चाहे जो सरकारी मामलों से नहीं जुड़ा हो — तो सामान्यतः पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं। लेकिन कार्य में आधिकारिक पद का उल्लेख नहीं होना चाहिए और यह सरकार के हित के विरुद्ध नहीं होना चाहिए।
नियम 8(3) — अनाम लेख भी प्रतिबंधित
यह एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है: छद्म नाम (pen name) या अनाम रूप से लिखा गया लेख भी उन्हीं नियमों के अधीन है। यदि लेख की विषय-वस्तु ऐसी है कि एक सरकारी कर्मचारी ने लिखा होगा — तो पहचान न होना बचाव नहीं है।
नियम 9 — सरकार की आलोचना
नियम 9 वह नियम है जिसे सबसे अधिक गलत समझा जाता है। इसके दो भाग हैं:
नियम 9(1) — क्या निषिद्ध है
कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी रूप में ऐसा संवाद नहीं करेगा जो:
- भारत सरकार या किसी राज्य सरकार की नीतियों और कार्यों की अनुचित आलोचना करे,
- किसी अन्य देश की सरकार के साथ भारत के संबंधों को प्रभावित करे,
- भारत की विदेश नीति को शर्मिंदगी में डाले।
नियम 9(2) — संसद और विधानसभाओं की आलोचना
संसद सदस्य या राज्य विधानसभा सदस्य की आलोचना ऐसे शब्दों में नहीं करेगा जिससे उनकी गरिमा प्रभावित हो। सामान्य नागरिक के रूप में विचार-विमर्श और तर्कसंगत टिप्पणी इससे अलग है।
"अनुचित आलोचना" का अर्थ — महत्वपूर्ण भेद
नियम 9 सभी आलोचना नहीं रोकता — केवल "अनुचित" आलोचना रोकता है। न्यायालयों ने इसे इस प्रकार समझाया है:
| अनुमत | निषिद्ध |
|---|---|
| उचित माध्यम से शिकायत और अभ्यावेदन | सार्वजनिक रूप से सरकारी नीतियों की अनुचित आलोचना |
| RTI आवेदन के माध्यम से सूचना माँगना | वर्गीकृत जानकारी मीडिया को लीक करना |
| अपने क्षेत्र में तकनीकी/शैक्षणिक टिप्पणी | सरकार को बदनाम करने के इरादे से आलोचना |
| सेवानिवृत्ति के बाद संस्मरण लिखना (उचित सीमाओं में) | गोपनीय सूचना या संवेदनशील बातचीत प्रकट करना |
सोशल मीडिया — आधुनिक चुनौती
DoPT ने सोशल मीडिया पर विशेष निर्देश जारी किए हैं। मुख्य बातें:
- सोशल मीडिया पर कोई भी पोस्ट जो नियम 9(1) के अंतर्गत आए — उल्लंघन है, चाहे कर्मचारी ने सरकारी पहचान न बताई हो।
- "Forward" करना भी "publish" माना जा सकता है।
- WhatsApp ग्रुप में की गई टिप्पणी भी यदि सार्वजनिक हो जाए — नियम का उल्लंघन हो सकता है।
- व्यंग्य और मीम्स भी इन नियमों के दायरे में आ सकते हैं।
पुस्तक प्रकाशन — अनुमति प्रक्रिया
यदि सरकारी मामलों से संबंधित पुस्तक प्रकाशित करनी हो:
- सक्षम प्राधिकारी को प्रस्ताव के साथ पांडुलिपि या सारांश जमा करें।
- प्राधिकारी जाँचेगा कि सामग्री वर्गीकृत, संवेदनशील या नीति-विरोधी तो नहीं।
- अनुमोदन के बाद ही प्रकाशन।
- सेवानिवृत्ति के बाद भी — यदि सेवाकाल की संवेदनशील जानकारी हो — अनुमति ज़रूरी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र. 1 — क्या कर्मचारी कविता या उपन्यास लिख सकता है?
हाँ — यदि सरकारी मामलों से नहीं जुड़ा हो, आधिकारिक पद का उल्लेख न हो, और सरकार के हित के विरुद्ध न हो। सामान्यतः पूर्व अनुमति नहीं चाहिए।
प्र. 2 — अनाम सोशल मीडिया अकाउंट से पोस्ट करना ठीक है?
नहीं। नियम 8(3) स्पष्ट है — छद्म नाम या अनाम रूप से भी यही नियम लागू होते हैं।
प्र. 3 — सेवानिवृत्ति के बाद क्या नियम 9 लागू होता है?
सेवाकाल की गोपनीय या संवेदनशील जानकारी के प्रकटीकरण पर प्रतिबंध सेवानिवृत्ति के बाद भी लागू हो सकते हैं — Official Secrets Act सहित अन्य कानूनों के तहत।
प्र. 4 — टेलीविज़न पर साक्षात्कार देना हमेशा प्रतिबंधित है?
पूर्व अनुमति के बिना। यदि साक्षात्कार सरकारी नीतियों से संबंधित नहीं है और कर्मचारी अपनी सरकारी पहचान नहीं बता रहा — तो नियम 8(2) लागू हो सकता है। लेकिन सावधानी और अनुमति बेहतर है।